Muli Ki Kheti Kaise Karen: मूली की खेती कैसे करें

Muli Ki Kheti Kaise Karen: मूली खेती भारत में सालों भर की जाती है। मगर सबसे पर्याप्त मात्रा में मूली खेती खरीफ के सीजन में किया जाता है। आज के समय में बीच का चुनाव करना काफी महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के उन्नत किस्म के बीच उपलब्ध हैं। सभी किसान भाई अच्छे से बीच की बुवाई करके जलप्रपात करते हैं। अभी का जो समय चल रहा है इस समय होली के दिन पर्याप्त मात्रा में हो रही है, जो की बहुत जल्द ठंड का मौसम आने वाला है और इस समय पूरे देश भर में मिलने की खेती किया जाता है।

मूली की खेती के लिए तैयार की जाने वाली मिट्टी में किसी तरह के ठोस अवशेष नहीं रहना चाहिए। क्योंकि फल जो होता है वह जमीन के अंदर होता है। इसलिए इसकी जुताई 5 से 6 बार अच्छी तरह कर लेनी चाहिए। मैदानी क्षेत्र में मुरली की बुवाई के लिए जून से जुलाई के अंत का समय सबसे अच्छा माना जाता है। डॉक्टर बी एस तोमर आगे बताते हैं कि उषा द्वारा विकसित की गई पूसा क्षेत्र की मूल्य की पैदावार 200 कुंतली प्रति हेक्टेयर मिलती है। यह मूली करीब 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी होती है मूल्य मुख्य रूप से 40 से 50 दिनों में तैयार हो जाता है।

Muli Ki Kheti Kaise Karen

भारतीय अनुष्ठान संस्था के मुताबिक खरीफ मूली की फसल में सबसे ज्यादा खतरा बरगडा रोग से होता है‌। इसलिए इससे बचने के लिए मिथाइल एक्सट्रैक्ट दवा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। इस रोग से बचने का सबसे कारगर तरीका लकड़ी की राख का खेतों में डस्टिंग करना जिससे आप फसल को बचा सकते हैं और अच्छी उपज के लिए आपको ऐसा करना होगा नहीं तो आपका फसल पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा।

Muli Ki Kheti Kaise Karen: मूली की खेती कैसे करें
Muli Ki Kheti Kaise Karen

मूली की खेती के लिए जलवायु

मूली की खेती के लिए जलवायु ठंड का मौसम अच्छा रहता है। इसकी खेती के लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस अच्छा तापमान माना जाता है। अधिक तापमान पर इसके जर करें और कड़वी हो सकती है। इसीलिए आप ठंड का मौसम के समय मूली की बुवाई करते हैं तो काफी अच्छा रहेगा।

मूली की खेती के लिए भूमि

मूली तो ऐसे मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में बोई जाती है मैदानी क्षेत्र में मुरली की बुवाई सितंबर से जनवरी तक की जा सकती है। जबकि पहाड़ी इलाकों में यह बोवाई अगस्त के महीना के आसपास आप कर सकते हैं। इसकी बुवाई के लिए मिट्टी का पीएच मां 5 से 6 के निकट अच्छा होता है, जबकि दोमट और बालूई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

इन पांच किस्मों की फायदा

रैपिड रेड व्हाइट टिपड:- मूली की इस किस्म का छिलका लाल रंग का होता है. इसकी जड़ें छोटे आकार की होती हैं. इनका गूदा सफेद रंग का होता है. ये स्वाद में थोड़ी मीठी होती है. इस किस्म की मूली बुवाई के करीब 25 से 30 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

पूसा हिमानी:- मूली की इस किस्म की जड़ें 30 से 35 सेंटीमीटर लंबी और मोटी होती हैं. इसका स्वाद हल्का तीखा होता है, लेकिन ये किस्म खाने में स्वादिष्ट होती है. ये किस्म बुवाई के 50 से 60 दिन में पककर तैयार हो जाती है. मूली इस किस्म की औसत पैदावार 320 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है।

जापानी सफेद:- मूली की इस किस्म की जड़ें सफेद होती हैं. ये किस्म बेलनाकर, कम तीखी, मुलायम और चिकनी होती है. यह किस्म बुवाई से 45 से 55 दिन में पककर तैयार हो जाती है. इस किस्म से 250 से लेकर 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

पूसा रेशमी:- मूली की इस किस्म की जड़ें 30 से 35 सेंटीमीटर लंबी होती है. यह समान रूप से चिकनी और हल्की तीखी होती है. यह किस्म बुवाई से करीब 55 से लेकर 60 दिन में पककर तैयार हो जाती है. इस किस्म से करीब 315 से लेकर 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है।

पंजाब पसंद:- यह मूली की जल्दी पकने वाली किस्म है. इस किस्म की खास बात यह है कि इसकी बुवाई किसी भी मौसम में की जा सकती है. इसकी जड़ें लंबी, रंग सफेद होती है. ये बुवाई के 45 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है।

मूली की खेती कैसे करें

मूली की खेती के लिए ठंडी जलवायु अच्छी रहती है ठंडी जलवायु में अगर आप मूली की बुवाई करते हैं तो इसमें आपको सिंचाई करने की ज्यादा आवश्यकता नहीं होगी। खेती करने से पहले 5 से 6 बार अच्छी तरह से जुताई कर लेना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरा हो जाए। मूली की फसल के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। क्योंकि मूली का फल जो होता है वह जमीन के अंदर होता है। इसलिए आपको गहरी जुताई की जरूरत पड़ेगी। ट्रैक्टर या मिट्टी पलटने वाले हाल से जुताई की जानी चाहिए। उसके बाद मुरली के बीजों को तीन से चार सेंटीमीटर की गहराई पर बोलना चाहिए ताकि बीजों का जमाव ठीक से हो सके।

मूली की खेती के लिए जल प्रबंधन

मूली के फसल में पहली सिंचाई तीन से चार दिन की अवस्था पर कर देनी चाहिए। मूली की सिंचाई भूमि के अनुसार काम ज्यादा करनी पड़ सकती है। सर्दियों में आप 10 से 15 दिनों के अंतराल पर जबकि गर्मियों में चार से पांच दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए।

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